Monday, October 5, 2026
Home आर्टिकल खेल मैदान बचाइए, तभी खेल संस्कृति बचेगी, खेल नीति में उत्तराखंड को...

खेल मैदान बचाइए, तभी खेल संस्कृति बचेगी, खेल नीति में उत्तराखंड को इस पर फोकस करने की जरूरत

        डा. प्रेम कश्यप, अध्यक्ष
प्रिंसिपल्स प्रोग्रेसिव स्कूल्स एसोसिएशन

उत्तराखण्ड सहित पूरे देश में शिक्षा का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। आधुनिक सुविधाओं से लैस बहुमंजिला विद्यालय भवनों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन इस विकास की एक बड़ी कीमत बच्चे चुका रहे हैं। विद्यालयों से खेल के मैदान लगातार गायब होते जा रहे हैं। आज अनेक स्कूल ऐसे हैं, जहाँ बच्चों के खेलने के लिए पर्याप्त खुला स्थान तक नहीं है। फुटबॉल, हॉकी, एथलेटिक्स या अन्य खेलों के लिए समुचित मैदान होना तो दूर, कई विद्यालयों में सुबह की प्रार्थना तक सीमित जगह में करानी पड़ती है।

यह केवल अवसंरचना का प्रश्न नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ी के शारीरिक, मानसिक और सामाजिक विकास का विषय है। वर्ष 2023 में उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय ने भी उन क्षेत्रों में बच्चों के लिए खेल मैदानों की कमी का स्वतः संज्ञान लिया था, जहाँ वे मजबूरी में सड़कों पर खेलते हैं। यह स्थिति ऐसे समय में चिंताजनक है, जब भारत खेल महाशक्ति बनने और विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं में स्थान बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

उत्तराखण्ड सरकार ने खेलों के विकास के लिए कई महत्वपूर्ण पहल की हैं। महाराणा प्रताप स्पोर्ट्स कॉलेज, देहरादून का विस्तार, गौलापार में उत्तराखण्ड खेल विश्वविद्यालय की स्थापना, खिलाड़ियों के लिए छात्रवृत्तियाँ, प्रोत्साहन योजनाएँ तथा रोजगार के अवसर इसी सोच का हिस्सा हैं। पूर्णानंद खेल मैदान, मुनि की रेती को राष्ट्रीय स्तर के फुटबॉल स्टेडियम के रूप में विकसित किया जाना भी स्वागतयोग्य कदम है। ये प्रयास स्पष्ट करते हैं कि सरकार खेलों को लेकर गंभीर है।

किन्तु खेलों के विकास की यह नीति तभी सफल होगी, जब इसकी शुरुआत विद्यालय स्तर से होगी। वास्तविकता यह है कि राज्य के अधिकांश सरकारी विद्यालयों में पर्याप्त खेल मैदान उपलब्ध नहीं हैं। दूसरी ओर दूरस्थ क्षेत्रों के विद्यार्थियों के लिए विकसित खेल परिसरों तक पहुँचना भी आसान नहीं है। आर्थिक सीमाएँ, परिवहन की कठिनाइयाँ और प्रशिक्षित कोचों की कमी बड़ी बाधाएँ हैं। यदि प्रतिभा को अवसर तक पहुँचने में ही कठिनाई हो, तो उत्कृष्ट खिलाड़ी तैयार करना कठिन होगा।

इस चुनौती का समाधान केवल प्रत्येक विद्यालय में विशाल खेल परिसर बनाना नहीं है। अधिक व्यावहारिक व्यवस्था यह हो सकती है कि प्रत्येक जिले या क्षेत्र में साझा खेल परिसर विकसित किए जाएँ, जहाँ आसपास के विद्यालयों के विद्यार्थी नियमित प्रशिक्षण प्राप्त कर सकें। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ियों तथा प्रशिक्षित कोचों की विशेषज्ञता भी ऐसे साझा केंद्रों के माध्यम से अधिकाधिक विद्यार्थियों तक पहुँचाई जा सकती है।

इन सभी प्रयासों के बीच एक गंभीर नीतिगत विरोधाभास भी सामने आता है। एक ओर सरकार विद्यालयों को खेल संस्कृति विकसित करने के लिए प्रेरित कर रही है, वहीं दूसरी ओर जिन निजी विद्यालयों ने अपने परिसर में बड़े खेल मैदान विकसित किए हैं, उन्हें उन्हीं खुले क्षेत्रों पर भारी संपत्ति कर देना पड़ता है। परिणामस्वरूप अनेक संस्थानों के लिए खेल मैदानों का संरक्षण आर्थिक रूप से कठिन होता जा रहा है। स्वाभाविक है कि ऐसी स्थिति में कुछ विद्यालय खुली भूमि को खेल मैदान बनाए रखने के बजाय भवन निर्माण के लिए उपयोग करना अधिक व्यावहारिक समझते हैं।

यदि यही प्रवृत्ति जारी रही तो भविष्य में आधुनिक भवन तो होंगे, लेकिन खेल मैदान नहीं। ऐसे विद्यालय परीक्षा परिणाम तो दे सकते हैं, पर उत्कृष्ट खिलाड़ी नहीं।

विश्व के सफल खेल राष्ट्रों का अनुभव बताता है कि खेल प्रतिभाएँ स्टेडियमों में नहीं, बल्कि विद्यालयों में तैयार होती हैं। चीन इसका प्रमुख उदाहरण है, जहाँ विद्यालय स्तर पर प्रतिभाओं की पहचान कर उन्हें वैज्ञानिक प्रशिक्षण दिया जाता है। इसी दीर्घकालिक दृष्टि ने उसे ओलंपिक खेलों की महाशक्ति बनाया है। भारत के लिए भी यही मार्ग अधिक उपयुक्त है।

समय की माँग है कि विद्यालयों में खेल अवसंरचना को केवल एक सुविधा नहीं, बल्कि शैक्षिक आवश्यकता माना जाए। खेल मैदानों को कर राहत या विशेष प्रोत्साहन दिया जाए, साझा खेल परिसरों का विकास किया जाए और सरकारी तथा निजी दोनों विद्यालयों को समान रूप से खेल संस्कृति के विस्तार में भागीदार बनाया जाए।

खेल केवल पदक जीतने का माध्यम नहीं हैं। वे अनुशासन, नेतृत्व, टीम भावना और संघर्षशीलता का प्रशिक्षण देते हैं। यदि हम वास्तव में ओलंपिक पदक विजेता और स्वस्थ समाज चाहते हैं, तो सबसे पहले विद्यालयों के खेल मैदान बचाने होंगे। खेल संस्कृति की शुरुआत वहीं से होती है, और उसका भविष्य भी वहीं तय होता है।

RELATED ARTICLES

नमो क्रिकेट लीग में बल्ला लेकर मैदान पर उतरे सीएम धामी, युवाओं को दिलाई नशामुक्ति की शपथ

पंचकूला। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी शुक्रवार को पंचकूला के ताऊ देवीलाल क्रिकेट स्टेडियम में आयोजित नमो क्रिकेट लीग में खिलाड़ियों के साथ...

Uttarakhand Premier League 2026: 21 सितंबर से UPL का धमाकेदार आगाज, वाणी कपूर के साथ ये लोक गायक मचाएंगे धूम

देहरादून। क्रिकेट के रोमांच के साथ बॉलीवुड और उत्तराखंड के लोक संगीत का संगम देखने के लिए तैयार हो जाइए। उत्तराखंड प्रीमियर लीग (UPL)...

SDSUV का 2026–27 का खेल कैलेंडर जारी: 6 अक्टूबर से होगी 11 खेलों की प्रतियोगिताएं, जानें पूरा कार्यक्रम

ऋषिकेश। श्री देव सुमन उत्तराखंड विश्वविद्यालय से संबद्ध महाविद्यालयों के खिलाड़ी अक्टूबर से दिसंबर तक 11 खेलों में अपनी प्रतिभा दिखाएंगे। विश्वविद्यालय ने सत्र...

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -



Most Popular

श्रद्धा सम्मान 2026: दिवंगत लोक कलाकारों के परिजनों का सम्मान, गांवों में रोजगार के अवसर बढ़ाने पर जोर

देहरादून। उत्तराखंड की लोक संस्कृति को जीवित रखने के लिए कलाकारों को उनके गांवों में ही नियमित प्रस्तुतियों और सम्मानजनक आजीविका के अवसर मिलने...

इंडिया गठबंधन का ऐलानः उत्तराखंड में ‘लोकतंत्र बचाओ–वोट बचाओ’ अभियान, 8 अक्टूबर को गांधी पार्क से मार्च

देहरादून। मतदाता सूची से नाम हटाए जाने और चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर इंडिया गठबंधन के सहयोगी दलों ने 2 से 8 अक्टूबर...

चार अक्टूबर तक चलेगा लोकपितृ स्मरण समारोह; कलाकारों के परिजनों और संघर्ष से प्रेरणा बनी महिलाओं को मिलेगा सम्मान

देहरादून। उत्तराखंड की लोक संस्कृति को समृद्ध करने वाले दिवंगत कलाकारों के योगदान को याद करते हुए ‘श्रद्धा सम्मान लोकपितृ स्मरण समारोह-2026’ का शुभारंभ...

Dehradun Crime: किराये के मकान से चल रहा था देह व्यापार का रैकेट, छह गिरफ्तार; नाबालिग मुक्त

देहरादून। पटेलनगर क्षेत्र में किराये के मकान से कथित देह व्यापार संचालित किए जाने के मामले में पुलिस ने छह लोगों को गिरफ्तार किया...

Recent Comments