देहरादून। उत्तराखंड की लोक संस्कृति को जीवित रखने के लिए कलाकारों को उनके गांवों में ही नियमित प्रस्तुतियों और सम्मानजनक आजीविका के अवसर मिलने चाहिए। ‘आवाज सुनो पहाड़ों की’ मंच के श्रद्धा सम्मान लोकपितृ स्मरण समारोह-2026 के दूसरे दिन आयोजित चर्चा में यह बात प्रमुखता से उठी। समारोह में दिवंगत लोक कलाकारों के परिजनों को सम्मानित किया गया और लोकगीतों के माध्यम से कलाकारों के योगदान को याद किया गया।
लोक कला और परंपराओं के संरक्षण में जीवन समर्पित करने वाले कलाकारों की स्मृति में मंच पिछले तीन वर्षों से यह समारोह आयोजित कर रहा है। आयोजन का उद्देश्य उनके योगदान को नई पीढ़ी तक पहुंचाना और उनके परिवारों के प्रति सम्मान प्रकट करना है।
लोक संस्कृति की जड़ों को मजबूत करने की जरूरत
कार्यक्रम में कैबिनेट मंत्री भारत सिंह चौधरी, हरिद्वार सांसद त्रिवेंद्र सिंह रावत, लोक गायक संतोष खेतवाल, जागर सम्राट प्रीतम भरतवाण, वरिष्ठ लोक गायक वीरेंद्र डंगवाल और लोक गायिका हेमा करासी सहित अनेक वरिष्ठ एवं युवा कलाकारों ने भाग लिया। उत्तराखंड के विभिन्न क्षेत्रों से पहुंचे कलाकारों ने भी चर्चा में अपनी बात रखी।
वक्ताओं ने कहा कि लोक संस्कृति का दायरा मंचीय प्रस्तुतियों से कहीं व्यापक है। इसकी पहचान गांवों के जीवन, रीति-रिवाजों और पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं से जुड़ी है। पलायन के कारण गांवों और लोक कलाकारों का यह संबंध कमजोर हो रहा है। ऐसे में सांस्कृतिक संरक्षण के प्रयासों को ग्रामीण जीवन और कलाकारों की आजीविका से जोड़ना आवश्यक है।
ग्राम और ब्लॉक स्तर पर मिलें नियमित प्रस्तुतियों के अवसर
चर्चा में ग्राम एवं ब्लॉक स्तर पर लोक कलाकारों के लिए नियमित सांस्कृतिक कार्यक्रम और रोजगार के अवसर विकसित करने पर जोर दिया गया। वक्ताओं का कहना था कि कलाकार अपनी कला के माध्यम से गांव में ही आजीविका अर्जित कर सकें, तो उन्हें रोजगार की तलाश में बाहर जाने के लिए मजबूर नहीं होना पड़ेगा।
मंच की ओर से कहा गया कि स्थानीय स्तर पर कलाकारों को अवसर और सम्मानजनक रोजगार उपलब्ध कराने से पलायन कम करने में मदद मिल सकती है। इससे लोकगीत, लोककला और पारंपरिक सांस्कृतिक विधाएं भी अपनी मूल जड़ों के साथ आगे बढ़ सकेंगी। उपस्थित अतिथियों और कलाकारों ने इस पहल का समर्थन करते हुए सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता बताई।
परिजनों के सम्मान के दौरान भावुक हुआ माहौल
दिवंगत लोक कलाकारों के परिजनों को सम्मानित किए जाने के दौरान समारोह का वातावरण भावुक हो गया। उपस्थित कलाकारों और दर्शकों ने अपने-अपने क्षेत्रों के लोकपितरों को श्रद्धांजलि दी। लोकगीतों की प्रस्तुतियों के बीच उनकी कला, सांस्कृतिक योगदान और जीवन से जुड़ी स्मृतियों को याद किया गया।
आयोजकों ने कहा कि कलाकार भले ही आज प्रत्यक्ष रूप से हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी रचनाएं और लोक संस्कृति के प्रति समर्पण समाज की स्मृतियों में जीवित हैं। उनके परिवारों का सम्मान इसी योगदान के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का प्रयास है।
4 अक्टूबर को दोपहर 12 बजे से समापन कार्यक्रम
श्रद्धा सम्मान लोकपितृ स्मरण समारोह-2026 का समापन 4 अक्टूबर को होगा। अंतिम दिन कार्यक्रम दोपहर 12 बजे से रात 8 बजे तक चलेगा। इस दौरान लोक संस्कृति से जुड़े विभिन्न कार्यक्रम और लोकगीतों की प्रस्तुतियां आयोजित की जाएंगी।






