Sunday, September 6, 2026
Home आर्टिकल कांग्रेस का आत्मघाती कार्ड

कांग्रेस का आत्मघाती कार्ड

समय के चक्र को पीछे लौटा कर सियासी चमत्कार कर दिखाने की सोच असल में समझ के दिवालियेपन का संकेत देती है। इस प्रयास में कांग्रेस ने सबकी पार्टी होने की अपनी विशिष्ट पहचान को संदिग्ध बना दिया है। चूंकि विचारधारा और जन-गोलबंदी के मोर्चों पर कांग्रेस नेतृत्व दीर्घकालिक रणनीति के जरिए राजनीति की नई समझ बनाने में विफल है, इसलिए अक्सर वह चुनाव जीतने के ऐसे टोना-टोटकों करने में लग जाता है, जिनके सफल होने की कोई गुंजाइश नहीं होती। हाल में उसने जातीय जनगणना और अस्मिता की राजनीति के ऐसे टोटके अपनाए हैँ। इसके पीछे सोच संभवत: यह है कि अगर जातीय विभाजन रेखा हिंदुओं के बीच राजनीतिक विमर्श का मुख्य बिंदु बन जाए, तो भाजपा की हिंदुत्व की सियासत को हराया जा सकता है।

यह मुद्दा अपनाते वक्त कांग्रेस (यह बात अन्य तमाम विपक्षी दलों पर भी लागू होती है) ने यह सोचने की जरूरत नहीं समझी कि आखिर जातीय न्याय की राजनीति उसका ट्रंप कार्ड कैसे हो सकती है, क्योंकि इससे खुद उसके अपने रिकॉर्ड पर कई सवाल उठेंगे। राहुल गांधी अगर कहते हैं कि सेक्रेटरी स्तर पर आज ओबीसी के सिर्फ तीन अधिकारी हैं, तो यह प्रश्न उनसे भी पूछा जाएगा कि इसके लिए कांग्रेस की कितनी जिम्मेदारी नहीं बनती है?

बहरहाल, मसला सिर्फ इतना नहीं है। इससे अधिक अहम बात यह है कि भाजपा अगर आज देश के एक बड़े हिस्से में अपराजेय मालूम पड़ती है, तो उसका एक प्रमुख कारण यह है कि जातीय प्रतिनिधित्व की आकांक्षाओं को उसने अपनी हिंदुत्व राजनीति के बड़े तंबू के अंदर समेट लिया है। इस तरह वह 1990 के दशक में उभरी मंडलवादी राजनीति की काट तैयार कर चुकी है। हकीकत यह है कि उत्तर भारत में आज ओबीसी मतदाताओं का सबसे बड़ा हिस्सा भाजपा का समर्थक है। दलित और आदिवासी समुदायों में भी उसकी पीठ अब काफी मजबूत हो चुकी है। इसके बीच समय के चक्र को पीछे लौटा कर सियासी चमत्कार कर दिखाने की सोच असल में समझ के दिवालियेपन का संकेत देती है। उधर इस प्रयास में कांग्रेस ने सबकी पार्टी होने के अपने यूएसपी को संदिग्ध बना दिया है। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में यह रणनीति आत्मघाती साबित हुई। क्या कांग्रेस अब ताजा चुनाव नतीजों से कोई सबक लेगी? इसकी संभावना कम है, क्योंकि दूसरा रास्ता श्रमसाध्य राजनीति का है, जिसके लिए विपक्ष अभी तैयार नहीं है।

RELATED ARTICLES

खेल मैदान बचाइए, तभी खेल संस्कृति बचेगी, खेल नीति में उत्तराखंड को इस पर फोकस करने की जरूरत

उत्तराखण्ड सहित पूरे देश में शिक्षा का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। आधुनिक सुविधाओं से लैस बहुमंजिला विद्यालय भवनों की संख्या बढ़ रही...

जाम में जकड़ा उत्तराखंड: बड़े शहरों के साथ-साथ प्रमुख पर्यटन और तीर्थ स्थलों पर जाम की समस्या बनी नासूर

अनिल चन्दोला देहरादून। शांत पहाड़ों, निर्मल नदियों और आध्यात्मिक यात्रा के लिए प्रसिद्ध उत्तराखंड का एक बड़ा हिस्सा इन दिनों भीषण ट्रैफिक जाम की समस्या...

पुरानी चुनौतियों के साथ ही रसोई गैस की किल्लत भी बढ़ाएगी चारधाम यात्रा की परेशानी, असमंजस में व्यवसायी

अनिल चन्दोला, देहरादून। उत्तराखंड में चार धाम यात्रा शुरू में अब चंद दिन ही बाकी हैं। हर साल की तरह इस बार भी लाखों श्रद्धालुओं...

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

सैलरी खत्म होने से पहले खत्म हो जाता है पैसा? अपनाइए सैलरी मैनेजमेंट का यह आसान मनी प्लानिंग फॉर्मूला,

देहरादून। अच्छी सैलरी होने के बावजूद यदि हर महीने हाथ तंग रहता है, तो समस्या कमाई की नहीं, पैसे की प्लानिंग की हो सकती...

देहरादून और हल्द्वानी में बिना मान्यता मदरसों पर शिकंजा, उत्तराखंड में अब तक 20 का संचालन बंद

देहरादून। उत्तराखंड में बिना मान्यता संचालित मदरसों की जांच के बाद प्रशासन की कार्रवाई का दायरा लगातार बढ़ रहा है। देहरादून में एक मदरसा...

डीएम हुए सख्तः देहरादून में नदियों में कूड़ा फेंकने वालों पर होगी FIR, अवैध डंपिंग साइटों पर भी कार्रवाई

देहरादून। नदियों और नदी किनारों पर कूड़ा डालने वालों के खिलाफ अब सीधे FIR दर्ज होगी। जिलाधिकारी डॉ. आशीष चौहान ने शहरी निकायों को...

यूकॉस्ट में शिक्षक दिवस पर व्य़ाख्यानः हिमालयी आपदाओं से निपटने में शिक्षकों और विद्यार्थियों की भूमिका अहम- प्रो. दुर्गेश पंत

देहरादून। हिमालयी क्षेत्रों में लगातार बढ़ रही आपदा संबंधी चुनौतियों के बीच जल स्रोतों के संरक्षण, वैज्ञानिक जल प्रबंधन और पर्यावरण के प्रति जागरूकता...

Recent Comments