अनिल चन्दोला, देहरादून।
उत्तराखंड की धरती एक बार फिर प्राकृतिक आपदाओं की मार झेल रही है। कभी गढ़वाल के उत्तरकाशी में धराली गाँव तो कभी चमोली का थराली, इन पहाड़ी इलाकों में बादल फटने और भूस्खलन की घटनाओं ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि हिमालय की गोद में बसे हमारे गांव कितने सुरक्षित हैं।
धराली में 5 अगस्त को आई तबाही अब भी लोगों के जेहन में ताजा है। माना जा रहा है कि बादल फटने के साथ ग्लेशियर टूटने ने मिलकर गांव को झकझोर दिया। मकान, होटल, दुकानें, मंदिर सब मलबे में समा गए। दर्जनों लोग लापता हुए और कई की जान चली गई। सेना, आईटीबीपी, एनडीआरएफ और एसडीआरएफ ने मिलकर सैकड़ों लोगों को बचाया, लेकिन आज भी धराली के लोग खुले आसमान के नीचे टेंटों में रात बिता रहे हैं।
थराली में भी 22 अगस्त को वही मंजर दोहराया गया। बादल फटा, सड़कों पर मलबा आया और दो लोगों की जान चली गई। इलाके की कई सड़कें बंद हो गईं, वाहन फंस गए और प्रशासन के लिए राहत पहुंचाना चुनौती बन गया। लगातार बारिश और भूस्खलन ने हालात और खराब कर दिए।
इन दोनों जगहों की तस्वीर एक जैसी है—बेघर परिवार, टूटी आजीविका, बर्बाद खेत, ढही हुई दुकानें और पर्यटन से जुड़े सपनों पर पानी। धराली जैसे इलाके, जो पर्यटन से जीवनयापन करते थे, अब पूरी तरह ठप हो गए हैं। होटल और होमस्टे ध्वस्त हैं, दुकानें मलबे में दबी हैं और जिन किसानों के खेत बच गए, वे भी डर में जी रहे हैं कि अगली बारिश सब कुछ बहा ले जाएगी।
लेकिन इन त्रासदियों का असर सिर्फ मकानों और आजीविका तक सीमित नहीं है। कई इलाकों में बिजली आपूर्ति अब भी नियमित नहीं हो पाई है। पीने के साफ पानी का संकट गहराया है, कई परिवार गंदे स्रोतों पर निर्भर हैं, जिससे बीमारियों का खतरा भी बढ़ा है। बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह ठप है क्योंकि स्कूल या तो बंद हैं या पहुँच से बाहर हो गए हैं। सड़कें बंद होने से सब्जियों, दवाइयों और अन्य आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति बाधित है। कई कटे हुए गाँवों में खाद्यान्न का संकट गहराने लगा है।
सरकार की ओर से मदद के प्रयास जारी हैं। उत्तराखंड सरकार ने पूर्ण रूप से क्षतिग्रस्त घरों को पाँच लाख रुपये की सहायता देने का ऐलान किया है। मुख्यमंत्री स्वयं प्रभावित क्षेत्रों का दौरा कर चुके हैं। केंद्र से भी राहत पैकेज की मांग की गई है। उत्तर प्रदेश जैसे पड़ोसी राज्यों ने भी राहत सामग्री भेजी है। पर सच यह है कि आपदा का आकार इतना बड़ा है कि अब तक की सहायता ऊंट के मुंह में जीरा जैसी लगती है।
समस्या केवल तात्कालिक नहीं है। इन आपदाओं ने यह चेतावनी भी दी है कि हिमालयी क्षेत्र अब लगातार जलवायु संकट की चपेट में है। मौसम का असामान्य पैटर्न, ग्लेशियरों का पिघलना और अनियोजित निर्माण कार्य मिलकर खतरे को और बढ़ा रहे हैं। धराली और थराली जैसी त्रासदियाँ महज घटनाएँ नहीं हैं, बल्कि संकेत हैं कि यदि अब भी हमने सतत विकास, आपदा पूर्वानुमान और सुरक्षित पुनर्वास पर ध्यान नहीं दिया तो भविष्य और भयावह हो सकता है।
धराली और थराली समेत अन्य हिस्सों में हुई त्रासदी ने एक बार फिर हमें याद दिलाया है कि पहाड़ केवल भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक और जीवनदायिनी धरोहर हैं। इन्हें बचाना केवल सरकार का काम नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। राहत और पुनर्वास की तत्काल चुनौतियों से आगे बढ़कर हमें इस पहाड़ी प्रदेश के भविष्य को सुरक्षित बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे।
यह घटनाएँ हमें सिखाती हैं कि आपदा केवल मलबा, आँसू और बर्बादी नहीं लाती, बल्कि यह हमारी नीतियों और प्राथमिकताओं की परख भी करती है। सवाल यह है कि क्या हम हर बार राहत कैंप और मुआवज़े तक ही सीमित रहेंगे, या फिर भविष्य की त्रासदियों को रोकने के लिए टिकाऊ समाधान तलाशेंगे। हिमालय को केवल संसाधन मानकर दोहन करने के बजाय, हमें उसे जीवित धरोहर समझकर संरक्षित करना होगा। पर्यावरणीय चेतावनियों की अनदेखी अब आत्मघाती साबित हो रही है। अगर हम आज भी नहीं चेते, तो कल धराली और थराली जैसे गाँव हमारे नक्शों से मिटते रहेंगे और हम सिर्फ शोक–सभा करने वाले समाज बनकर रह जाएंगे।
यह समय संवेदना और सहानुभूति से आगे बढ़कर ठोस नीति और निर्णायक कार्रवाई का है। तभी इन पहाड़ों की पीड़ा कम होगी और उत्तराखंड की आने वाली पीढ़ियाँ सुरक्षित सांस ले सकेंगी।
तुंरत राहत के साथ ही दीर्घकालिक रणनीति बनाने की जरूरत
हर साल आती आपदा और उससे होने वाले नुकसान से बचने या उसका प्रभाव कम करने के लिए दीर्घकालिक रणनीति बनाने की भी जरूरत है। फिलहाल तो सरकार को प्रभावित परिवारों के लिए सुरक्षित स्थाई आवास, उनके लिए रोजगार व स्वरोजगार की व्यवस्था, पर्यटन, कृषि और छोटे व्यवसायों को पुनर्जीवित करने की ठोस योजना, हर गाँव और कस्बे में आपदा प्रबंधन तंत्र मजबूत करने की योजना तैयार करनी होगी। सामुदायिक प्रशिक्षण, त्वरित चेतावनी प्रणाली और सुरक्षित आश्रय स्थल तैयार किए जाएं और सड़क, बिजली, पानी और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं की बहाली में तेजी लाई जाए। सड़क और पुल जैसे ढांचे का निर्माण केवल इंजीनियरिंग के आधार पर नहीं, बल्कि पर्यावरणीय संवेदनशीलता को ध्यान में रखकर हो। साथ ही, पहाड़ में विकास कार्यों के दौरान पर्यावरण को कम से कम नुकसान पहुंचे इसका भी ध्यान रखना होगा। पहाड़ में बसावटों की सुरक्षा का नियमित तौर पर आंकलन होना चाहिए ताकि आपदा के समय होने वाले नुकसान को कम से कम किया जा सके।






