देहरादून। जिंदगी के खाते में आखिर ‘कुल जमा’ क्या रह जाता है—कुछ सफलताएं, कुछ नाकामियां, कुछ स्पर्श, कुछ आवाजें और अधूरे-पूरे सपने। इसी भाव को आधार बनाकर युवा लेखिका और सरकारी अधिकारी श्रुति वत्स ने अपने पहले कविता संग्रह को नाम दिया है ‘कुल जमा’। संग्रह में शामिल 107 छोटी-बड़ी कविताओं के जरिए उन्होंने आम जिंदगी की संवेदनाओं से लेकर महिलाओं की स्थिति, सामाजिक असमानता, प्रेम, प्रकृति और बदलते रिश्तों तक कई विषयों को शब्द दिए हैं।
कविता संग्रह ‘कुल जमा’ का लोकार्पण बुधवार को कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल ने देहरादून के यमुना कॉलोनी स्थित अपने सरकारी आवास पर किया। इस दौरान साहित्य और संस्कृति से जुड़े कई लोग मौजूद रहे।
जिंदगी का हिसाब-किताब है ‘कुल जमा’
श्रुति वत्स ने संग्रह के नाम के पीछे की सोच को भी सामने रखा है। उनके मुताबिक आम आदमी की पूरी जिंदगी को देखा जाए तो आखिर में उसके हिस्से में अनुभवों का एक संग्रह ही बचता है। सफलता और असफलता के साथ रिश्ते, सपने, स्मृतियां, आवाजें और स्पर्श जिंदगी के इसी ‘कुल जमा’ का हिस्सा बनते हैं।
संग्रह की 107 कविताओं में इन्हीं मानवीय अनुभवों को अलग-अलग रूप में अभिव्यक्त करने की कोशिश की गई है। कहीं प्रेम की कोमल अनुभूतियां हैं तो कहीं प्रकृति के रंग। कई रचनाएं सामाजिक विसंगतियों और असमानता पर सवाल उठाती हैं।
प्रेम और प्रकृति का दिखता है गहरा रिश्ता
श्रुति की कविताओं में प्रेम केवल दो व्यक्तियों के बीच की भावना बनकर नहीं आता, बल्कि प्रकृति उसके साथ लगातार चलती दिखाई देती है। बारिश, चांद, घाटियां, जुगनू, पेड़ों से गिरती सूखी पत्तियां, रेत और गांव का तालाब जैसे प्राकृतिक बिंबों के सहारे उन्होंने प्रेम और स्मृतियों को अभिव्यक्ति दी है।
एक कविता में बारिश और चांद के जरिए प्रेम की अनुभूति सामने आती है, जबकि दूसरी रचना में जुगनुओं, सूखी पत्तियों, रेत और तालाब जैसे प्रतीकों के माध्यम से व्यक्ति के अपने अस्तित्व में घुल जाने की भावना दिखाई देती है।
महिलाओं की दुनिया और बंदिशों पर सवाल
‘कुल जमा’ में महिला विमर्श एक प्रमुख विषय के रूप में सामने आता है। संग्रह की कई कविताएं महिलाओं के जीवन, उनकी सामाजिक स्थिति और उन पर लगी बंदिशों के आसपास केंद्रित हैं।
श्रुति वत्स महिलाओं को परंपरागत सीमाओं से बाहर निकलने और आगे बढ़ने का संदेश भी देती हैं। एक कविता में उन्होंने सार्वजनिक जीवन में पुरुषों और महिलाओं के लिए उपलब्ध अलग-अलग सामाजिक जगहों की ओर ध्यान खींचा है। उनका संकेत उस व्यवस्था की तरफ है, जिसमें पुरुष सार्वजनिक स्थानों पर देश-दुनिया पर चर्चा करते दिखाई देते हैं, जबकि महिलाओं की दुनिया अक्सर घर की चारदीवारी और रोजमर्रा की जिम्मेदारियों तक सीमित रह जाती है।
पहाड़ के दर्द को मेहनतकश हाथों से जोड़ा
संग्रह में सामाजिक असमानता और शोषण की अभिव्यक्ति भी दिखाई देती है। खास बात यह है कि लेखिका कई जगह इंसान और प्रकृति के दर्द को एक-दूसरे के समानांतर रखती हैं।
रिसते पहाड़, टूटती चट्टानें और कूड़ा बीनने वाले हाथों की दरारों को एक साथ रखकर उन्होंने प्राकृतिक और मानवीय पीड़ा के बीच एक संबंध बनाने की कोशिश की है। इन कविताओं में पहाड़ केवल प्राकृतिक भूगोल नहीं, बल्कि संघर्ष और पीड़ा के प्रतीक के रूप में भी सामने आता है।
बाजार में बदलते रिश्तों पर भी चोट
बाजारवाद के प्रभाव से मानवीय रिश्तों में आ रहे बदलाव को भी ‘कुल जमा’ में जगह मिली है। श्रुति ने रिश्तों, धार्मिक आस्था, खबरों, सामाजिक प्रतिष्ठा और प्रेम तक में बाजार के बढ़ते प्रभाव को अपनी कविताओं का विषय बनाया है।
उनकी रचनाएं इस सवाल की ओर ध्यान खींचती हैं कि क्या आधुनिक समाज में भावनाएं और रिश्ते भी धीरे-धीरे बाजार की शर्तों से संचालित होने लगे हैं। संग्रह में इस तरह के सवाल सीधे और बेबाक अंदाज में सामने आते हैं।
सरकारी नौकरी के साथ साहित्य सृजन की सराहना
श्रुति वत्स वर्तमान में नरेंद्रनगर में खंड विकास अधिकारी (BDO) के पद पर कार्यरत हैं। उनके पति प्रसिद्ध लोकगायक रजनीकांत सेमवाल हैं।
कविता संग्रह के लोकार्पण पर कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल ने श्रुति के साहित्यिक प्रयास की सराहना की। उन्होंने कहा कि सरकारी सेवा की जिम्मेदारियों के बीच साहित्य सृजन के लिए समय निकालना आसान नहीं होता। इसके बावजूद श्रुति की साहित्य के प्रति लगन ने उनके पहले कविता संग्रह को संभव बनाया।
कार्यक्रम में श्रुति वत्स ने अपने कविता संग्रह की रूपरेखा और इसके पीछे की सोच साझा की। साहित्यकार मुकेश नौटियाल ने ‘कुल जमा’ की समीक्षा प्रस्तुत की। इस अवसर पर वरिष्ठ साहित्यकार गजेंद्र नौटियाल, बीना बैंजवाल, नीता कुकरेती, चारधाम महापंचायत के महासचिव डॉ. बृजेश सती और प्रकाशक प्रबोध उनियाल प्रमुख रूप से मौजूद रहे। कार्यक्रम का संचालन सैयद सादाब अली ने किया।






