देहरादून। दुष्कर्म और अपहरण के मामले में देहरादून की अदालत ने आरोपी दर्शन सिंह को दोनों आरोपों से बरी कर दिया है। अदालत ने महिला के बयानों में विरोधाभास और आरोपों की पुष्टि करने वाले पर्याप्त साक्ष्य नहीं होने को फैसले का आधार माना। मामले में बचाव पक्ष की ओर से अधिवक्ता अजय बड़ोनी के तर्कों को कोर्ट ने अहम माना और उनके मुवक्किल के पक्ष में फैसला दिया।
अपर जिला एवं सेशन जज/एफटीएससी (पोक्सो) मँजु सिंह मुंडे की अदालत ने यह निर्णय सुनाया। हरियाणा के कैथल निवासी दर्शन सिंह के खिलाफ पटेलनगर थाने में वर्ष 2023 में मुकदमा दर्ज हुआ था। उन पर भारतीय दंड संहिता की धारा 365 और 376 के तहत आरोप लगाए गए थे।
बचाव पक्ष की दलीलों और अभियोजन के साक्ष्यों का परीक्षण
सुनवाई के दौरान अधिवक्ता अजय बड़ोनी ने दर्शन सिंह की ओर से बचाव पक्ष रखा। अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के साथ महिला के बयान, चिकित्सकीय साक्ष्य और जांच से जुड़े दस्तावेजों का परीक्षण किया। अभियोजन की ओर से सात गवाह पेश किए गए और 13 दस्तावेजी साक्ष्य प्रदर्शित कराए गए। अदालत ने पाया कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्यों से आरोपी के खिलाफ अपहरण और बिना सहमति शारीरिक संबंध बनाने के आरोप सिद्ध नहीं होते।
अप्रैल 2023 में युवती के लापता होने से जुड़ा था मामला
अभियोजन के अनुसार, अप्रैल 2023 में युवती के घर से लापता होने के बाद उसके पिता ने पुलिस से शिकायत की थी। आरोप था कि ऑनलाइन ऐप के माध्यम से संपर्क में आए दर्शन सिंह ने युवती को बहला-फुसलाकर मेरठ और उसके बाद हरियाणा ले जाकर उसकी सहमति के बिना शारीरिक संबंध बनाए। पुलिस ने जांच के बाद आरोपपत्र दाखिल किया। अदालत में सुनवाई के दौरान इन आरोपों के समर्थन में पेश गवाहों और दस्तावेजों की जांच की गई।
पहले बयान और अदालत की गवाही में मिला अंतर
अदालत ने महिला के दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के तहत दर्ज बयान और अदालत में दी गई गवाही में महत्वपूर्ण विरोधाभास पाया। निर्णय के अनुसार, मजिस्ट्रेट के समक्ष दर्ज बयान में महिला ने आरोपी से प्रेम करने और स्वेच्छा से संबंध बनाने की बात कही थी। इसके विपरीत, अदालत में दी गई गवाही में उसने बहला-फुसलाकर ले जाने और जबरन संबंध बनाने के आरोप लगाए। अदालत ने साक्ष्यों का मूल्यांकन करते हुए इन विरोधाभासों को अहम माना।
आरोपों की पुष्टि करने वाले अन्य साक्ष्यों का अभाव
अदालत ने निर्णय में कहा कि अभियोजन ऐसा अन्य साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सका, जिससे यह पुष्टि हो कि आरोपी महिला को बहला-फुसलाकर या जबरन मेरठ और उसके बाद कुरुक्षेत्र ले गया तथा उसकी सहमति के बिना संबंध बनाए। चिकित्सकीय साक्ष्यों, डॉक्टरों की गवाही और अन्य मौखिक एवं दस्तावेजी साक्ष्यों पर विचार करने के बाद अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोप साबित करने में असफल रहा।
दोनों धाराओं में दोषमुक्त, जमानतियों को दायित्व से मुक्ति
अदालत ने दर्शन सिंह को भारतीय दंड संहिता की धारा 365 और 376 के आरोपों से दोषमुक्त कर दिया। वह पहले से जमानत पर थे। निर्णय के साथ उनका व्यक्तिगत बंधपत्र और जमानतनामे निरस्त करते हुए जमानतियों को उनके दायित्व से मुक्त कर दिया गया। हालांकि, दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 437-ए के तहत दाखिल बंधपत्र निर्धारित वैधानिक अवधि तक प्रभावी रहेंगे।






