देहरादून। हिमालयी क्षेत्रों में लगातार बढ़ रही आपदा संबंधी चुनौतियों के बीच जल स्रोतों के संरक्षण, वैज्ञानिक जल प्रबंधन और पर्यावरण के प्रति जागरूकता को शिक्षा से जोड़ने की जरूरत पर यूकॉस्ट में मंथन हुआ। शिक्षक दिवस के अवसर पर आयोजित विशेषज्ञ व्याख्यान में उत्तराखंड राज्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद के महानिदेशक प्रोफेसर दुर्गेश पंत ने कहा कि हिमालय को आपदा के खतरों से बचाने के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी हैं और इस अभियान में शिक्षकों व विद्यार्थियों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है।
उत्तराखंड राज्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद (यूकॉस्ट) की ओर से पांच सितंबर 2026 को परिषद सभागार में जल शिक्षा कार्यक्रम के तहत विशेषज्ञ व्याख्यान आयोजित किया गया। शिक्षक दिवस और हिमालय दिवस सप्ताह के अवसर पर आयोजित इस कार्यक्रम में राज्य के विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों और इंटर कॉलेजों से शिक्षक व विद्यार्थी जुड़े।
मुख्य अतिथि प्रोफेसर दुर्गेश पंत ने शिक्षक दिवस की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि शिक्षक विद्यार्थियों को केवल पाठ्यक्रम की शिक्षा नहीं देते, बल्कि उन्हें राष्ट्र निर्माण की दिशा में सोचने और आगे बढ़ने का मार्ग भी दिखाते हैं। उन्होंने कहा कि हिमालयी भूभाग में सामने आ रही विभिन्न आपदा जनित घटनाएं सभी के लिए चिंता का विषय हैं।
उन्होंने कहा कि आपदाओं के प्रभाव को कम करने के लिए पर्यावरण संरक्षण को केवल सरकारी कार्यक्रम न मानकर जनभागीदारी का अभियान बनाना होगा। शिक्षकों की जिम्मेदारी है कि वे विद्यार्थियों में जल, जंगल, जमीन और हिमालयी पारिस्थितिकी के संरक्षण के प्रति संवेदनशीलता विकसित करें। विद्यार्थी भी स्थानीय स्तर पर जल स्रोतों, प्राकृतिक संसाधनों और पर्यावरण को बचाने के प्रयासों में भागीदारी निभा सकते हैं।
कार्यक्रम का संचालन करते हुए यूकॉस्ट के वैज्ञानिक और जल शिक्षा कार्यक्रम प्रभारी डॉ. भवतोष शर्मा ने आयोजन के उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। उन्होंने भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जीवन और शिक्षा क्षेत्र में उनके योगदान का उल्लेख करते हुए कहा कि उनके जन्मदिवस को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। उन्होंने कार्यक्रम में शामिल उत्तराखंड के विभिन्न विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों और इंटर कॉलेजों के शिक्षकों एवं विद्यार्थियों का स्वागत किया।
यूकॉस्ट के संयुक्त निदेशक डॉ. डीपी उनियाल ने कार्यक्रम की भूमिका रखते हुए जल शिक्षा और पर्यावरणीय जागरूकता को समय की जरूरत बताया। कार्यक्रम की शुरुआत राष्ट्रीय गीत के गायन से हुई।
विशेषज्ञ वक्ता के रूप में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के स्कूल ऑफ एनवायरमेंटल साइंसेज के प्रोफेसर पी.के. जोशी ने ‘हिमालय वॉटर रिसोर्सेस’ विषय पर अपना व्याख्यान दिया। उन्होंने हिमालयी क्षेत्रों में जल संसाधनों की स्थिति और जल संरक्षण के उपायों पर विस्तार से चर्चा की।
प्रोफेसर जोशी ने आपदा जोखिम न्यूनीकरण, जल संसाधन प्रबंधन, स्प्रिंगशेड मैनेजमेंट, पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं और जल शिक्षा में शिक्षकों की भूमिका को विस्तार से समझाया। उन्होंने कहा कि हिमालयी क्षेत्र में आपदाओं को समझने और उनके असर को कम करने के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ स्थानीय अनुभवों और पारंपरिक ज्ञान को भी महत्व देना होगा।
उन्होंने जल संरक्षण और रेनवाटर हार्वेस्टिंग के महत्व पर भी बात रखी। साथ ही, हिमालयी जल संसाधनों की निगरानी और आपदा प्रबंधन में रिमोट सेंसिंग तथा जीआईएस तकनीक के उपयोग की जानकारी दी। उन्होंने स्थानीय ज्ञान की भूमिका पर जोर देते हुए कहा कि पहाड़ी क्षेत्रों में जल स्रोतों और प्राकृतिक परिस्थितियों को लेकर स्थानीय समुदायों का अनुभव संरक्षण व प्रबंधन की योजनाओं को अधिक प्रभावी बनाने में मदद कर सकता है।
कार्यक्रम के दौरान प्रतिभागियों ने जल संरक्षण, हिमालयी आपदाओं, प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा और तकनीक आधारित आपदा प्रबंधन से जुड़े सवाल भी रखे, जिनका विशेषज्ञों ने समाधान किया।
कार्यक्रम के अंत में वैज्ञानिक डॉ. मंजू सुंदरियाल ने धन्यवाद ज्ञापित किया। जल शिक्षा कार्यक्रम प्रभारी डॉ. भवतोष शर्मा ने संचालन किया। इस अवसर पर यूकॉस्ट के वैज्ञानिक डॉ. ओमप्रकाश नौटियाल, डॉ. राजेंद्र सिंह राणा, डॉ. पीयूष जोशी, डॉ. जगबीर असवाल, डॉ. जागृति उनियाल, अर्चित पांडे, विकास नौटियाल, उमेश जोशी, ओम जोशी और राजदीप जंग सहित प्रोजेक्ट मैनेजमेंट यूनिट का वैज्ञानिक स्टाफ मौजूद रहा।
कार्यक्रम में राज्य के विभिन्न शिक्षण संस्थानों के प्राध्यापकों, शिक्षकों और विद्यार्थियों सहित 100 से अधिक लोगों ने प्रतिभाग किया।






