अनिल चन्दोला, देहरादून।
उत्तराखंड के लिए यह साल आपदा के दृष्टिकोण से बेहद मनहूस साबित हो रहा है। सितंबर आधा बीतने के बावजूद तेज बारिश हो रही हैं और उसके कारण अलग-अलग हिस्सों में बड़े पैमाने पर नुकसान भी हो रहा है। इस साल अब तक 260 से ज्यादा लोग आपदा में अपनी जान गंवा चुके हैं। इसके अलावा बड़ी संख्या में लोग घायल हुए और लापता है। हजारों लोग आपदा के कारण प्रभावित हुए हैं। सैकड़ों लोगों के घर-मकान, व्यापारिक प्रतिष्ठान आपदा की भेंट चढ़ गए। बहुत से लोगों ने अपने प्रियजनों को खो दिया। लोगों के सामने अब दो जून की रोटी का भी संकट पैदा हो गया है। उनके पास सिर छिपाने की जगह तक नहीं है।
2025 में उत्तराखंड प्रकृति के भंयकर प्रकोप का गवाह बना है। फरवरी से सितम्बर तक लगातार आपदाओं ने न केवल राज्य के प्राकृतिक स्वरूप को हिला दिया बल्कि यहाँ की सामाजिक-आर्थिक स्थिति पर भी गहरी चोट छोड़ी। हिमस्खलन, भूस्खलन, बादल फटना, फ्लैश फ़्लड और नदियों में बहाव से हुई मौतों ने हर किसी को झकझोर कर रख दिया है। इस वर्ष की घटनाओं ने एक बार फिर यह सवाल उठाया कि क्या हिमालयी क्षेत्रों में विकास कार्य और बदलता मौसम चक्र, आपदाओं को और विकराल बना रहे हैं?
भौगोलिक संकट व मौसम में बदलाव से बढ़ी परेशानी
उत्तराखंड हिमालय की संवेदनशील भौगोलिक संरचना पर बसा है। यहाँ की धरती युवा और अस्थिर है। कई पहाड़ ऐसे हैं, जो लूज रॉक से बने हैं। बरसात के मौसम में यह अस्थिरता कई बार मौत का कारण बनती है। वैज्ञानिक लगातार चेतावनी देते रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन के चलते अब बारिश के पैटर्न बदल गए हैं। सामान्य बरसात की जगह कुछ ही घंटों में भारी बारिश होना और फिर लंबे समय तक सूखा बने रहना अब आम हो गया है। यही असंतुलन भूस्खलन और फ्लैश फ़्लड जैसी घटनाओं को जन्म देता है।
इस साल सितंबर में भी तेज बारिश
उत्तराखंड में आमतौर पर मानसून जून में आता है और सितंबर अंत या अक्टूबर पहले हफ्ते में विदा होता है। अगस्त खत्म होने तक बारिश काफी कम हो जाती है। लेकिन इस साल ऐसा नहीं हुआ। सितम्बर आधा से ज्यादा बीत चुका है। उसके बावजूद ज्यादातर क्षेत्रों में न सिर्फ तेज बारिश हो रही है बल्कि उसके कारण बड़े पैमाने पर नुकसान भी हो रहा है।
उत्तराखंड में इस साल प्राकृतिक आपदा की प्रमुख घटनाएं
चमोली हिमस्खलन – 28 फ़रवरी 2025
28 फ़रवरी को चमोली जिले के माणा गाँव के पास स्थित सीमा सड़क संगठन (BRO) के कैंप पर अचानक हिमस्खलन आ गया। इस हादसे में आठ जवान बर्फ की चपेट में आ गए और सभी की मौत हो गई। बाद में सभी शव बरामद कर लिए गए।
रुद्रप्रयाग भूस्खलन – 31 मई 2025
31 मई को रुद्रप्रयाग जिले के केदारनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर एक वाहन भूस्खलन की चपेट में आ गया। चालक की मौत हो गई और पाँच यात्री घायल हुए, जिनमें से दो गंभीर घायल हुए।
उत्तरकाशी भूस्खलन – 29 जून 2025
29 जून को उत्तरकाशी जिले के सिलाई बेंड क्षेत्र में एक होटल निर्माण स्थल के पास भूस्खलन हुआ। दो मजदूरों की मौत हो गई और सात लापता हो गए। मलबे में दबे श्रमिकों को निकालने के लिए रेस्क्यू अभियान कई दिनों तक चला।
धराली–हर्षिल फ्लश फ्लड – 5 अगस्त 2025
5 अगस्त को उत्तरकाशी जिले के धराली और हर्षिल क्षेत्र में खीर गाड़ में अचानक आई बाढ़ व भूस्खलन ने पूरे इलाके को तबाह कर दिया। चार से पाँच मौतों की पुष्टि हुई जबकि पचास से अधिक लोग प्रारंभिक रिपोर्टों में लापता बताए गए। कई शव बाद में बरामद हुए और गाँवों में पशु-हानि भी हुई।
देवत भूस्खलन – 19 अगस्त 2025
19 अगस्त को पिथौरागढ़ जिले के ग्राम देवत में भूस्खलन से एक घर पर भारी पत्थर गिरा। इस हादसे में बारह वर्षीय बच्चा मारा गया और परिवार के चार सदस्य घायल हो गए।
अतिवृष्टि और भूस्खलन – 29 अगस्त 2025
29 अगस्त को रुद्रप्रयाग, चमोली और बागेश्वर जिलों में लगातार बादल फटने, तेज बारिश और भूस्खलन की घटनाएँ हुईं। इन घटनाओं में पाँच लोगों की मौत हुई ग्यारह से ज्यादा लापता हुए। कई गाँव प्रभावित हुए और पशुओं की भी बड़ी हानि हुई।
मुनकटिया भूस्खलन – 1 सितम्बर 2025
एक सितम्बर को रुद्रप्रयाग जिले के केदारनाथ यात्रा मार्ग पर मुनकटिया क्षेत्र में अचानक वाहन पर मलबा गिर पड़ा। दो यात्रियों की मौत हो गई और छह घायल हुए।
देहरादून अतिवृष्टि और बाढ़ – 16–17 सितम्बर 2025
16 और 17 सितम्बर को देहरादून जिले और उसके आसपास बादल फटने और भारी बारिश की घटनाएँ हुईं। इस आपदा में 13 से 18 लोगों की मौत की पुष्टि हुई, जबकि 13 से 16 लोग लापता बताए गए। कई शव राहत कार्यों के दौरान बरामद किए गए। बाढ़ और भूस्खलन ने घरों को बहा दिया और शहर से लेकर गाँव तक को तबाह कर दिया।
उत्तराखंड को प्रकृति की गंभीर चेतावनी
2025 का साल उत्तराखंड के लिए प्रकृति की एक गंभीर चेतावनी लेकर आया है। लगातार आपदाएँ यह दर्शाती हैं कि हिमालयी क्षेत्र जलवायु परिवर्तन और अव्यवस्थित विकास की संयुक्त मार झेल रहा है। राज्य को अब आपदा-प्रतिरोधी ढाँचे, चेतावनी प्रणालियों, और सतत विकास की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे। यदि ऐसा नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में “रूठी हुई प्रकृति” और भी अधिक विकराल रूप लेकर सामने आ सकती है।






