नई दिल्ली/हल्द्वानी। उत्तराखंड के हल्द्वानी स्थित बनभूलपुरा क्षेत्र में रेलवे भूमि को लेकर लंबे समय से चल रहे विवाद पर मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया। अदालत ने स्पष्ट किया कि विवादित भूमि भारतीय रेलवे की है और सार्वजनिक प्रयोजन के लिए दर्ज भूमि पर अनधिकृत कब्जा वैध अधिकार में परिवर्तित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि भूमि के उपयोग का अधिकार संबंधित प्राधिकरण के पास ही रहेगा।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि किसी भी अतिक्रमण को केवल लंबे समय से निवास के आधार पर कानूनी स्वामित्व का दर्जा नहीं दिया जा सकता। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि कब्जाधारी यह तय नहीं कर सकते कि रेलवे भूमि का उपयोग कैसे किया जाए। रेलवे को अपनी विकास और विस्तार योजनाओं के अनुरूप निर्णय लेने का अधिकार है।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने मामले के मानवीय पक्ष को भी गंभीरता से लिया। अदालत ने निर्देश दिया कि प्रभावित परिवारों के साथ संवेदनशील और विधिसम्मत प्रक्रिया अपनाई जाए। पात्र व्यक्तियों के पुनर्वास और वैकल्पिक व्यवस्था के संबंध में राज्य सरकार उपलब्ध योजनाओं के तहत आवश्यक कदम उठाए। किसी भी कार्रवाई में विधिक प्रक्रिया और पर्याप्त समय देना अनिवार्य होगा।
वर्षों से अतिक्रमण की जद में है रेलवे की जमीन
बनभूलपुरा क्षेत्र में वर्षों से बड़ी आबादी रेलवे भूमि पर निवास कर रही है। इस मामले ने पूर्व में भी प्रशासनिक और न्यायिक स्तर पर व्यापक चर्चा को जन्म दिया था। सुप्रीम कोर्ट के ताजा निर्णय के बाद अब प्रशासन को आदेश के अनुपालन की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे।
इस फैसले से जहां रेलवे परियोजनाओं के लिए भूमि उपयोग का रास्ता साफ हुआ है, वहीं प्रभावित परिवारों के पुनर्वास को लेकर प्रशासन की जिम्मेदारी भी बढ़ गई है। आने वाले समय में राज्य सरकार और रेलवे की ओर से विस्तृत कार्ययोजना सामने आने की संभावना है।
रेलवे की है विवादित भूमि, जैसा चाहे इस्तेमाल करे
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बनभूलपुरा की विवादित भूमि भारतीय रेलवे की है और उस पर किया गया अतिक्रमण वैध अधिकार का आधार नहीं बन सकता। अदालत ने कहा कि कब्जाधारी यह निर्धारित नहीं कर सकते कि भूमि का उपयोग किस प्रकार किया जाए। यह अधिकार रेलवे और संबंधित प्राधिकरण के पास रहेगा। प्रभावित परिवारों के मामले में मानवीय दृष्टिकोण अपनाने और पात्र व्यक्तियों के पुनर्वास पर विचार करने के निर्देश दिए गए हैं। किसी भी कार्रवाई में विधिक प्रक्रिया, पारदर्शिता और पर्याप्त समय देने पर जोर दिया गया है।






