Wednesday, September 16, 2026
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Kishau Project MoU: 80 साल का इंतजार खत्म होने की ओर, छह राज्यों की सहमति से आगे बढ़ेगी किशाऊ परियोजना

नई दिल्ली/देहरादून। जिस किशाऊ परियोजना की योजना देश की आजादी से भी पहले तैयार हुई थी, उसे करीब आठ दशक बाद धरातल पर उतारने की दिशा में बड़ी प्रगति हुई है। केंद्र सरकार की मौजूदगी में छह राज्यों ने इस बहुउद्देशीय परियोजना को लेकर समझौता किया है। इसके साथ ही लंबे समय से अटकी परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए राज्यों के बीच समन्वय का नया रास्ता खुल गया है।

नई दिल्ली स्थित कर्तव्य भवन में केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में हुई बैठक में उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली के बीच समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए गए।

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इसे परियोजना के इतिहास में महत्वपूर्ण पड़ाव बताया। उनका कहना है कि वर्षों से अलग-अलग स्तर पर प्रयास किए जाने के बावजूद किशाऊ परियोजना आगे नहीं बढ़ पाई थी। अब केंद्र और संबंधित राज्यों के बीच बनी सहमति से इसके क्रियान्वयन की दिशा में तेजी आने की उम्मीद है।

आजादी से सात साल पहले आया था किशाऊ का विचार

किशाऊ परियोजना कितनी पुरानी है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इसकी परिकल्पना वर्ष 1940 में की गई थी। इसके बाद कई दशक बीत गए, सरकारें बदलीं और परियोजना को आगे बढ़ाने के प्रयास भी हुए, लेकिन विभिन्न अड़चनों के चलते इसे अपेक्षित गति नहीं मिल सकी।

मुख्यमंत्री धामी के अनुसार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में लंबे समय से लंबित परियोजनाओं को आगे बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। किशाऊ को लेकर भी पिछले कुछ समय से केंद्र और राज्यों के बीच लगातार बातचीत चल रही थी।

इस दिशा में 16 जून 2026 की बैठक महत्वपूर्ण रही। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में हुई उस बैठक में परियोजना से जुड़े कई लंबित विषयों पर चर्चा हुई और समाधान की दिशा में सहमति बनी। इसके बाद संबंधित राज्यों के बीच समन्वय आगे बढ़ा और अब MoU तक बात पहुंची है।

किशाऊ में सिर्फ बिजली नहीं, पानी भी बड़ी वजह

किशाऊ परियोजना की अहमियत केवल बांध बनाने या बिजली पैदा करने तक सीमित नहीं है। यह अपर यमुना बेसिन में पानी की उपलब्धता और उसके बेहतर प्रबंधन से भी सीधे जुड़ी हुई है।

प्रस्तावित परियोजना से करीब 1562 MCM क्षमता का जलाशय तैयार होगा। इसके साथ ही 422 मेगावाट बिजली उत्पादन की क्षमता विकसित करने की योजना है।

उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश परियोजना के प्रमुख भागीदार हैं, जबकि उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली को भी इससे लाभ मिलने की उम्मीद है। सिंचाई और पेयजल उपलब्धता बढ़ाने के साथ परियोजना को यमुना के पुनर्जीवीकरण की दिशा में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

छह राज्यों के हित जुड़े, इसलिए सहमति थी सबसे अहम

अंतरराज्यीय परियोजना होने के कारण किशाऊ को आगे बढ़ाने के लिए केवल उत्तराखंड या हिमाचल प्रदेश का फैसला पर्याप्त नहीं था। परियोजना से मिलने वाले पानी और दूसरे लाभों से कई राज्यों के हित जुड़े हैं। ऐसे में राज्यों के बीच सहमति और केंद्र के साथ समन्वय इसकी सबसे महत्वपूर्ण जरूरतों में रहा है।

मुख्यमंत्री धामी ने छह राज्यों के बीच हुए समझौते को सहकारी संघवाद का उदाहरण बताया। उन्होंने उम्मीद जताई कि MoU के बाद परियोजना से जुड़ी आगे की प्रक्रियाओं को तेजी से पूरा किया जा सकेगा।

बांध बनेगा तो पुनर्वास का सवाल भी होगा अहम

परियोजना के फायदों के साथ इससे प्रभावित होने वाले परिवारों का मुद्दा भी सामने आएगा। उत्तराखंड सरकार ने स्पष्ट किया है कि प्रभावित परिवारों के पुनर्वास को प्राथमिकता दी जाएगी।

मुख्यमंत्री के मुताबिक विकास की प्रक्रिया में उन परिवारों के हितों की सुरक्षा जरूरी है, जिन्हें परियोजना के कारण विस्थापन या दूसरी तरह के प्रभावों का सामना करना पड़ सकता है। सरकार उचित और सम्मानजनक पुनर्वास सुनिश्चित करने की बात कह रही है।

2500 हेक्टेयर वन भूमि की जरूरत, यहां आएगी बड़ी चुनौती

परियोजना के क्रियान्वयन में पर्यावरण और वन भूमि से जुड़ा पहलू भी महत्वपूर्ण होगा। इसके लिए करीब 2500 हेक्टेयर वन भूमि के हस्तांतरण की आवश्यकता बताई गई है।

इतने बड़े वन क्षेत्र के बदले क्षतिपूरक वनीकरण के लिए भी पर्याप्त भूमि उपलब्ध करानी होगी। पर्वतीय और वन बहुल उत्तराखंड के लिए इतनी जमीन की व्यवस्था करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

मुख्यमंत्री धामी ने इसी वजह से केंद्र और परियोजना में शामिल दूसरे राज्यों से क्षतिपूरक वनीकरण के लिए भूमि चिन्हित करने में सहयोग मांगा है। राज्य सरकार का कहना है कि परियोजना को आगे बढ़ाते समय वन और पर्यावरण से जुड़े नियमों का पालन किया जाएगा।

MoU हुआ, लेकिन असली परीक्षा अब शुरू

छह राज्यों के बीच समझौता किशाऊ परियोजना के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि जरूर है, लेकिन इसके बाद परियोजना के वास्तविक क्रियान्वयन की प्रक्रिया अहम होगी। वन एवं पर्यावरण संबंधी प्रक्रियाएं, भूमि, पुनर्वास और अलग-अलग राज्यों के बीच आगे का समन्वय इसके अगले चरणों में महत्वपूर्ण रहेंगे।

मुख्यमंत्री ने विश्वास जताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के मार्गदर्शन में संबंधित राज्य परियोजना को समयबद्ध तरीके से आगे बढ़ाएंगे।

दिल्ली में हुए इस महत्वपूर्ण घटनाक्रम के दौरान केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी.आर. पाटिल, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता, राजस्थान के मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा, हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी और हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू समेत संबंधित राज्यों और केंद्र के प्रतिनिधि मौजूद रहे।

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