Friday, March 13, 2026
Home आर्टिकल कांग्रेस का आत्मघाती कार्ड

कांग्रेस का आत्मघाती कार्ड

समय के चक्र को पीछे लौटा कर सियासी चमत्कार कर दिखाने की सोच असल में समझ के दिवालियेपन का संकेत देती है। इस प्रयास में कांग्रेस ने सबकी पार्टी होने की अपनी विशिष्ट पहचान को संदिग्ध बना दिया है। चूंकि विचारधारा और जन-गोलबंदी के मोर्चों पर कांग्रेस नेतृत्व दीर्घकालिक रणनीति के जरिए राजनीति की नई समझ बनाने में विफल है, इसलिए अक्सर वह चुनाव जीतने के ऐसे टोना-टोटकों करने में लग जाता है, जिनके सफल होने की कोई गुंजाइश नहीं होती। हाल में उसने जातीय जनगणना और अस्मिता की राजनीति के ऐसे टोटके अपनाए हैँ। इसके पीछे सोच संभवत: यह है कि अगर जातीय विभाजन रेखा हिंदुओं के बीच राजनीतिक विमर्श का मुख्य बिंदु बन जाए, तो भाजपा की हिंदुत्व की सियासत को हराया जा सकता है।

यह मुद्दा अपनाते वक्त कांग्रेस (यह बात अन्य तमाम विपक्षी दलों पर भी लागू होती है) ने यह सोचने की जरूरत नहीं समझी कि आखिर जातीय न्याय की राजनीति उसका ट्रंप कार्ड कैसे हो सकती है, क्योंकि इससे खुद उसके अपने रिकॉर्ड पर कई सवाल उठेंगे। राहुल गांधी अगर कहते हैं कि सेक्रेटरी स्तर पर आज ओबीसी के सिर्फ तीन अधिकारी हैं, तो यह प्रश्न उनसे भी पूछा जाएगा कि इसके लिए कांग्रेस की कितनी जिम्मेदारी नहीं बनती है?

बहरहाल, मसला सिर्फ इतना नहीं है। इससे अधिक अहम बात यह है कि भाजपा अगर आज देश के एक बड़े हिस्से में अपराजेय मालूम पड़ती है, तो उसका एक प्रमुख कारण यह है कि जातीय प्रतिनिधित्व की आकांक्षाओं को उसने अपनी हिंदुत्व राजनीति के बड़े तंबू के अंदर समेट लिया है। इस तरह वह 1990 के दशक में उभरी मंडलवादी राजनीति की काट तैयार कर चुकी है। हकीकत यह है कि उत्तर भारत में आज ओबीसी मतदाताओं का सबसे बड़ा हिस्सा भाजपा का समर्थक है। दलित और आदिवासी समुदायों में भी उसकी पीठ अब काफी मजबूत हो चुकी है। इसके बीच समय के चक्र को पीछे लौटा कर सियासी चमत्कार कर दिखाने की सोच असल में समझ के दिवालियेपन का संकेत देती है। उधर इस प्रयास में कांग्रेस ने सबकी पार्टी होने के अपने यूएसपी को संदिग्ध बना दिया है। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में यह रणनीति आत्मघाती साबित हुई। क्या कांग्रेस अब ताजा चुनाव नतीजों से कोई सबक लेगी? इसकी संभावना कम है, क्योंकि दूसरा रास्ता श्रमसाध्य राजनीति का है, जिसके लिए विपक्ष अभी तैयार नहीं है।

RELATED ARTICLES

उत्तराखंड में सालभर रूठी रही प्रकृति, 260 से ज्यादा की मौत, कई अब तक लापता, करोड़ों का नुकसान

अनिल चन्दोला, देहरादून। उत्तराखंड के लिए यह साल आपदा के दृष्टिकोण से बेहद मनहूस साबित हो रहा है। सितंबर आधा बीतने के बावजूद तेज बारिश...

देहरादून में आपदा से बड़े पैमाने पर नुकसान, अनियोजित विकास ने बढ़ाया दर्द, अब सबक लेने का वक्त

अनिल चन्दोला, देहरादून राजधानी देहरादून सोमवार को बादल फटने और अतिवृष्टि की विभीषिका से दहल उठी। देर रात हुई मूसलाधार बारिश ने टौंस, तमसा, रिस्पना...

धराली से थराली तक: आपदा और उम्मीद के बीच पहाड़, हिमालय की गोद में बसे हमारे गांव कितने सुरक्षित

अनिल चन्दोला, देहरादून। उत्तराखंड की धरती एक बार फिर प्राकृतिक आपदाओं की मार झेल रही है। कभी गढ़वाल के उत्तरकाशी में धराली गाँव तो कभी...

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

रसोई गैस और ईंधन की कालाबाजारी पर कड़ी निगरानी रख रही सरकार, तीन दिनों में 280 जगह किया निरीक्षण

देहरादून। प्रदेश में एलपीजी और अन्य ईंधन की उपलब्धता तथा वितरण व्यवस्था को व्यवस्थित बनाए रखने के लिए खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता मामले...

UTTARAKHAND BUDGET: 1.11 लाख करोड़ का बजट पेश, गरीब-युवा-किसान और महिलाओं पर फोकस

गैरसैंण/देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा के बजट सत्र में सोमवार को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए राज्य का वार्षिक बजट प्रस्तुत किया।...

अर्थव्यवस्था में उत्तराखंड की ऊंची छलांग, जीडीपी डेढ़ गुना बढ़ी, प्रति व्यक्ति आय में भी उल्लेखनीय बढ़ोत्तरी

देहरादून। उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था में तेजी का दौर जारी है। राज्य का सकल घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) वर्ष 2024–25 में बढ़कर ₹3,81,889 करोड़ पहुंच गया है,...

उत्तरांचल प्रेस क्लब में रंगारंग होली मिलन महोत्सव की धूम, रंगों की फुहार और लोक संगीत की गूंज में सरोबार हुए लोग

देहरादून। देहरादून में उत्तरांचल प्रेस क्लब का होली मिलन समारोह इस बार खास उत्साह और भव्यता के साथ आयोजित हुआ। रंगों की फुहार, लोक...

Recent Comments