देहरादून। दुष्कर्म, अपहरण और POCSO के गंभीर आरोपों में करीब पांच साल से जेल में बंद अरुण कुमार चौहान को देहरादून की विशेष POCSO अदालत ने सभी आरोपों से बरी कर दिया है। लंबी चली सुनवाई में बचाव पक्ष के अधिवक्ता अजय बड़ोनी ने अभियोजन की कहानी और उसके साक्ष्यों को चुनौती देते हुए कई अहम विरोधाभास अदालत के सामने रखे। पीड़िता के अलग-अलग बयानों, मेडिकल रिपोर्ट, गेस्ट हाउस के रिकॉर्ड और दोनों परिवारों के बीच पहले से चले आ रहे विवाद से जुड़े तथ्यों को परखने के बाद अदालत ने माना कि अभियोजन आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर पाया।
विशेष न्यायाधीश (POCSO)/अपर जिला जज कुसुम शानी की अदालत ने 22 सितंबर 2026 को फैसला सुनाया। कोर्ट ने अरुण चौहान को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त किया और किसी अन्य मामले में वांछित नहीं होने पर तत्काल रिहा करने के आदेश दिए।
2020 में दर्ज हुआ था मुकदमा
मामला रायपुर थाने में वर्ष 2020 में दर्ज मुकदमा संख्या 287/2020 से जुड़ा है। अरुण चौहान के खिलाफ POCSO Act की धारा 5/6 के साथ तत्कालीन आईपीसी की धारा 363, 366ए और 376 के तहत आरोप लगाए गए थे। अभियोजन ने पीड़िता और उसकी मां समेत आठ गवाह पेश किए, जबकि बचाव पक्ष की ओर से तीन गवाहों की गवाही कराई गई।
मामले की सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के अधिवक्ता अजय बड़ोनी ने अभियोजन के गवाहों से जिरह के साथ ही उन साक्ष्यों पर फोकस किया, जिनमें घटना के अलग-अलग विवरण सामने आ रहे थे।
चार साल के रिश्ते की बात बनी महत्वपूर्ण
फैसले में पीड़िता के धारा 164 सीआरपीसी के तहत दर्ज बयान का उल्लेख है। इसमें उसने आरोपी को पहले से जानने और दोनों के करीब चार साल से रिश्ते में होने की बात कही थी। रिकॉर्ड के मुताबिक उसने घर से निकलने के बाद आरोपी से संपर्क करने और उसके साथ ग्वालियर जाने की बात भी कही थी।
बचाव पक्ष ने इसी बयान को आधार बनाते हुए पीड़िता को जबरन अथवा बहला-फुसलाकर ले जाने के अभियोजन के आरोप पर सवाल उठाए। ट्रायल के दौरान दिए गए बयान और पहले दर्ज बयानों के अंतर को भी जिरह में प्रमुखता से सामने रखा गया।
मेडिकल रिपोर्ट पर भी टिकी बचाव पक्ष की दलील
अधिवक्ता अजय बड़ोनी ने मेडिकल साक्ष्यों को भी अपनी दलीलों का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया। पीड़िता का परीक्षण करने वाली डॉक्टर की गवाही के मुताबिक शरीर पर चोट के निशान नहीं मिले थे। UPT जांच निगेटिव थी और पैथोलॉजी रिपोर्ट में स्लाइड्स पर शुक्राणु नहीं पाए गए।
कोर्ट ने मेडिकल रिपोर्ट को अकेले निर्णायक आधार नहीं माना, लेकिन दूसरे साक्ष्यों और बयानों में आए अंतर के साथ इसका भी मूल्यांकन किया।
गेस्ट हाउस के रिकॉर्ड पर जिरह से खड़े हुए सवाल
मुकदमे में गेस्ट हाउस से जुड़ा रिकॉर्ड भी अहम रहा। अभियोजन ने आरोपी के वहां ठहरने से संबंधित साक्ष्य पेश किया था, लेकिन जिरह में गेस्ट हाउस से जुड़े गवाह ने स्वीकार किया कि अदालत में पेश मूल रजिस्टर में 27 से 29 अक्टूबर 2020 के बीच आरोपी के आने-जाने की संबंधित एंट्री मौजूद नहीं थी।
बचाव पक्ष ने इस तथ्य को अभियोजन की कहानी में एक और महत्वपूर्ण विरोधाभास के रूप में अदालत के सामने रखा।
पांच लाख रुपये के विवाद का पहलू भी आया सामने
बचाव पक्ष ने मुकदमे के पीछे दोनों परिवारों के बीच पहले से चले आ रहे आर्थिक विवाद का तर्क भी दिया। अरुण चौहान ने अपने बयान में दावा किया कि नौकरी दिलाने के नाम पर पांच लाख रुपये दिए गए थे और रकम वापस मांगने के बाद विवाद हुआ।
फैसले के मुताबिक पीड़िता की मां की जिरह में भी यह तथ्य सामने आया कि मौजूदा मुकदमा दर्ज होने से पहले आरोपी के पिता की ओर से उनके खिलाफ ग्वालियर में शिकायत दी गई थी। अदालत ने आर्थिक विवाद से जुड़े इस पहलू को भी रिकॉर्ड पर मौजूद दूसरे साक्ष्यों के साथ परखा।
POCSO की धारा 29 पर भी हुई कानूनी बहस
सुनवाई में POCSO Act की धारा 29 के तहत आरोपी के विरुद्ध बनने वाली वैधानिक धारणा भी महत्वपूर्ण रही। अदालत ने संबंधित न्यायिक निर्णयों का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि अभियोजन को पहले अपराध से जुड़े बुनियादी तथ्यों को विश्वसनीय साक्ष्यों से स्थापित करना होता है।
पूरे रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंची कि अभियोजन POCSO Act की धारा 5/6 और आईपीसी की धारा 363, 366ए तथा 376 के आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर पाया।
पांच साल बाद मिली जेल से रिहाई
अदालत ने अरुण कुमार चौहान को सभी आरोपों से दोषमुक्त करते हुए जेल प्रशासन को रिहाई का आदेश भेजने को कहा। फैसला सुनाए जाने के समय वह देहरादून जिला कारागार में बंद थे।
इस मुकदमे में बचाव पक्ष के अधिवक्ता अजय बड़ोनी की जिरह महत्वपूर्ण रही, जिसमें पीड़िता के अलग-अलग बयानों से लेकर मेडिकल और दस्तावेजी साक्ष्यों तक के विरोधाभास अदालत के सामने आए। हालांकि अंतिम फैसला अदालत ने पूरे रिकॉर्ड और सभी पक्षों की दलीलों का मूल्यांकन करने के बाद दिया।






